‘आहें न भरी शिकवे न किए…’


शशिकला ने 1962 की जिस ‘आरती’ में तेज तर्रार बुरी औरत का किरदार निभाकर कसम खाई थी कि वह फिल्मों में काम नहीं करेंगी, उसी ‘आरती’ ने उन्हें अपार शोहरत दी और इतना काम दिया कि कर कर के शशिकला थक गर्इं। वे हीरोइन के रूप असफल रहीं। निर्माता के रूप में असफल रहीं। मगर झगड़ालू औरत की खल भूमिकाओं ने उन्हें फिल्मजगत में मशहूर बनाया। फिर तो ‘फूल और पत्थर’, ‘गुमराह’, ‘आई मिलन की बेला’, ‘हिमालय की गोद में’, ‘अनुपमा’, ‘जंगली’ जैसी सौ से ज्यादा फिल्में कर उन्होंने फिल्मजगत का एक कोना अपने लिए सुरक्षित रख लिया। हर सफलता के बाद समय ने उनके सामने मुश्किलें खड़ी की, मगर शशिकला ने न आहें भरी न शिकवे किए, बस उनका सामना किया।

प्राण और नूरजहां को लाहौर में 1942 की ‘खानदान’ से फिल्मी परदे पर उतारने वाले शौकत हुसैन रिजवी अपनी माशूका नूरजहां को लेकर 1944-45 में ‘जीनत’ बना रहे थे। रिजवी को तलाश थी एक किशोरी की जो नूरजहां की बेटी की भूमिका निभा सके। नूरजहां की सिफारिश पर एक 11 साल की लड़की उनके सामने थी। लड़की सोलापुर में पैदा हुई थी और अपने पिता के साथ काम की तलाश में मुंबई आई थी।

जब लड़की ने संवाद बोले तो रिजवी निराश हो गए। उसके उच्चारण में गहरा मराठी पुट था, जो उनकी उर्दू फिल्म ‘जीनत’ के लिए किसी काम का नहीं था। रिजवी की झुंझलाहट देख किशोरी के चेहरे पर गहरी पीड़ा के भाव थे, क्योंकि उसे काम की सख्त जरूरत थी। लंबे समय से घर में जब तब चूल्हा जलता था। इस भूमिका से पहले उसे मजबूरी मे घरेलू नौकरानी का काम तक करना पड़ा था। हालांकि रिजवी नूरजहां की सिफारिश ठुकराना नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने दूसरा रास्ता निकाला।

रिजवी उस समय जीनत के लिए एक कव्वाली ‘आहें न भरी शिकवे न किए..’ दिमाग में लिए घूम रहे थे। इसे सिर्फ जनानियां, महिलाएं, ही गाने वाली थीं। हिंदी सिनेमा में यह अपनी किस्म का पहला प्रयोग था। नूरजहां, जौहराबाई अंबालावाली और कल्याणी की आवाज में कव्वाली रिकॉर्ड थी। रिजवी ने इसी कव्वाली में बैठी लड़कियों में किशोरी को भी तालियां बजाने के लिए बैठा दिया।

पीछे बैठीं लड़कियां ठीक से ताली बजाने का काम करें इसके लिए रिजवी ने कहा जो भी लड़की सबसे अच्छा काम करेगी, उसे 20 रुपए का इनाम दिया जाएगा। 20 रुपए के लालच ने किशोरी को ‘आहें न भरी शिकवे न किए…’ में डुबो दिया और उसने 20 रुपए का इनाम जीत लिया। यह दीवाली का दिन था। इन 20 रुपयों से खुश किशोरी ने अपने तीन भाइयों और दो बहनों के नए कपड़ों के साथ मिठाई और पटाखे खरीदे और दीवाली अच्छे से मनाई।

उधर रिजवी ने इस किशोरी से तीन साल का अनुबंध किया। यह किशोरी थी शशिकला, जिनके पिता कपड़ों के संपन्न कारोबारी थे मगर अपनी उदारता ने उन्हें दीवालिया बना दिया था। शशिकला का चार अप्रैल को उसी मुंबई में निधन हुआ, जिसने उन्हें शोहरत और दौलत दी और अपनी तरह की एक अलग ‘परदे की बुरी औरत’ का तमगा भी बख्शा। शशिकला का पूरा जीवन खुशियों को मुट्ठी में रेत की तरह पकड़ने में बीता। 19 साल की उम्र में ओमप्रकाश सहगल से शादी की जो केएल सहगल के परिवार से ताल्लुक रखते थे।

वे घी के इतने बड़े कारोबारी थे कि लोग उनसे लाइन लगाकर घी खरीदते थे। शादी होते ही ‘फिल्म स्टार के पति’ होने की खब्त में उन्हें घी बेचने का धंधा हैसियत गिराने वाला लगा। सो उसे बंद कर बीवी के दिमाग में फिल्म बनाने की नई खब्त डाल दी। शशिकला ने अपनी जमा पूंजी से किशोर कुमार को अपना हीरो बनाकर ‘करोड़पति’ (1961) शुरू की, जो छह साल में बनी और जब लगी तो शशिकला को कंगाल बना गई।

फिर पति से झगड़े बढ़े। शशिकला ने एक व्यक्ति में खुशियां ढूंढ़ी और उसके साथ विदेश चली गर्इं। उसने असली रूप दिखाया तो वापस लौट आर्इं। आत्मिक शांति खोने लगी तो आध्यात्मिकता से उसे पकड़ना चाहा। आठ-नौ साल मदर टेरेसा से जुड़ी रहीं। लोगों की सेवा में सुख ढूंढ़ने की कोशिश की। मगर आत्मिक शांति की जो ‘कस्तूरी गंध’ उन्हें बेचैन कर रही थी वह उन्हें वापस अभिनय में खींच लाई और वे टीवी पर काम करने लगीं थीं। अंतिम समय में शशिकला छोटी बेटी के साथ मुंबई के कोलाबा में रहती थीं।






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