किसान आंदोलन और ‘बिस्कुट की खेती’ पर तीरंदाज का व्यंग्य


वह किसान जैसा दिख रहा था, सो पुलिसवालों ने उसे रोक लिया था। पूछताछ की थी और वह वास्तव में किसान ही निकला था। उनकी सघन तहकीकात ने व्यक्ति का सच उभार दिया था। सिपाहियों की कार्रवाई और सूझबूझ से बड़े साहब खुश हुए थे। सिपाहियों ने फटे नंगे पैरों, मैली धोती और उसके ऊपर झूलते कुर्ते की वजह से उसे ताड़ लिया था और फिर रोक कर ऐसे तीखे सवाल पूछे थे कि उसको अपनी असलियत स्वीकार करनी पड़ी थी।

यह पुलिस की बड़ी उपलब्धि थी, किसान को पहचानना कोई हंसी-खेल नहीं था। शहर के बॉर्डर पर भीड़ वाले इलाके में जहां सब पैंट-कमीज पहने आ-जा रहे हों वहां एक धोती पहने किसान को किसान के रूप में पहचान लेना वास्तव में पुलिसिया गिद्ध दृष्टि का पूर्ण प्रमाण था।

साहब ने पत्रकार वार्ता बुला कर इस अभूतपूर्व पकड़ का देश-देशांतर में एलान कर दिया था। उन्होंने पत्रकार वार्ता में कहा था कि पुलिस की चौकसी के चलते किसान पकड़ा तो गया था, पर अभी तक उसने अपने शहर तक पहुंचने के पीछे की साजिश को नहीं उगला था। हर तरह से पूछताछ की जा रही थी, पर किसान लॉकअप में गूंगा-सा बैठा पथराई आखों से अपने सामने जड़ी लोहे की सलाखों को देखे जा रहा था। लाठी की चोट खाकर भी उसको दर्द नहीं हो रहा था।

वैसे हम पुलिस वाले, बड़े साहब ने कहा था, हिरासत में लिए लोगों को प्रताड़ना नहीं देते हैं, पर वह जिस तरह से पत्थर होकर बैठा था, उसको समझाने के लिए हमने हल्का बल प्रयोग किया था। इस कार्रवाई का आप लोग गलत मतलब मत लगाइएगा, हम सिर्फ देखना चाहते थे उसको दर्द हो रहा है या नहीं- वह हाड़-मांस का हम जैसा इंसान है या किसान है।

साहब ने चाय की चुस्की ली थी और अपनी गोदी में खेलते मीडिया के लिए कुछ बिस्कुट उछाल दिए थे। यह देख कर उनको अच्छा लगा था कि मीडियाकर्मियों ने उनको हवा में ही लपक लिया था। एक भी बिस्कुट का टुकड़ा जमीन पर नहीं गिरा था। वे संतुष्ट होकर मुस्कराए थे। मीडिया की ट्रेनिंग कारगर रूप से हो रही थी। हवा में तैरते बिस्कुट लपकना वे सीख गए थे।
दोस्तो, उन्होंने पत्रकारों से कहा, वह बैठा है और चुप है।

इससे साफ है कि वह जिद्दी है। वह थोड़ा बौराया हुआ भी लग रहा है। पर, यह सब दीगर है, मुद्दा यह है कि वह यहां तक पंहुचा कैसे? क्या वह खुद आया है या फिर लाया गया है? खुद तो वह आ नहीं सकता था। उसकी कमर तो पहले ही तोड़ दी गई थी। इससे साफ है कि उसको लाया गया है। शहर में व्याप्त स्वच्छ माहौल को गंदा करने के लिए एक फटीचर को झंडे की तरह घुमाने की साजिश रची गई है। किसान को छोड़ें, साजिश को समझें। झंडे का डंडा तो हम निकाल ही देंगे, आप साजिश पर जुट जाइए। उसको तार-तार कर दीजिए।

हम कैसे साजिश ढूंढ़ सकते हैं। यह काम तो साहब, आपका है। एक पत्रकार ने मासूमियत से पूछा था। साहब का मूड खराब हो गया था। अरे भई, ये कौन लंपट है? इसकी किसने ट्रेनिंग की है? उन्होंने झल्ला कर पूछा था। अरे, तार-तार का मतलब है कहीं का तार कहीं जोड़ दो… स्पार्किंग कराओ, शार्टसर्किट हो जाए। कुछ आग-वाग लग जाए। फिर हाय-तौबा मच जाएगी। सब कन्फ्यूज्ड हो जाएंगे। कन्फ्यूजन में ही सलूशन है।

पत्रकार बात सुन कर थोड़े कन्फ्यूज तो जरूर हुए थे, पर सलूशन सुन कर उत्साहित हो गए थे। साहब का पुराना नुस्खा, जो हर मर्ज की दवा था- कन्फ्यूजन- अब भी कारगर था। एक्सपायरी डेट खत्म होने के बाद भी कन्फ्यूजन की खुराक मुर्दा मुद्दों को जिंदा कर देती थी और जिंदों को ऐसा संक्रमित करती थी कि कोरोना वाले वेंटीलेटर भी उसकी सांस को नियंत्रित नहीं कर पाते थे। जीते-जी मारने में उस्ताद थे साहब। वैसे भी किसान क्या चीज है? जब बिस्कुट मिल रहे हों तो अन्न की क्या जरूरत थी?

साहब कुछ और भी कहने जा रहे थे कि बड़े हाकिम का फोन आ गया था। फौरन आओ, हाकिम ने फरमान सुनाया था। साहब तुरंत चल दिए थे। आखिरकार बिस्कुट की फुल सप्लाई हाकिम के यहां से ही तो आती थी। वास्तव में साहब सालों से हाकिम की अनुबंध खेती करते थे। हाकिम उनसे जमीन तैयार करवाता था और फिर उस पर बिस्कुट उगाता था। सबको फायदा ही फायदा था। पर अचानक एक बौड़म आ गया था। शुक्र है जल्दी ही पहचान लिया गया था और अब लॉकअप में बैठा था। बिस्कुट खाने से मना कर रहा था। बीच-बीच में कुछ अन्न-अन्न जैसा बुदबुदाता था और फिर पथरा जाता था।

साहब ने सिपाहियों से कहा था कि किसी भी तरह गिरफ्त में आए हुए फटीचर को अगर वे बिस्कुट चखा दें तो उसका अन्न का नशा उतर जाएगा। किसान धोती से पैंट पर आ जाएगा और साहब के खुशहाल शहर का स्वच्छ बाशिंदा बन जाएगा। पर हर प्रयास विफल हो गया था।

हाकिम ने साहब से कहा कि किसान को आयसोलेट कर दो, ठीक वैसे ही जैसे कोरोना में होता है। और लोगों को जोड़ो। उनको बताओ कि किस तरह से बिस्कुट उगाना हमारी प्राचीन परंपरा रही है। सिंधु घाटी की सभ्यता बिस्कुट की खेती करके विशाल और समृद्ध हुई थी। किसान अशिक्षित है, समझता नहीं है कि बिस्कुट उगा कर हम शहर का विकास ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि पूर्वजों की धरोहर को और यशस्वी बना रहे हैं।

पौराणिक काल में बिस्कुट की खेती के साक्ष्य बहुतेरे हैं और जिसको इन पर विश्वास न हो वह पाकिस्तान चला जाए, क्योंकि मुअनजोदड़ो वहीं है। और अगर वहां जाने में उन्हें कुछ एतराज हो, तो वे सरस्वती नदी सभ्यता की खोज में चल रही खुदाई में श्रमदान करना शुरू कर दें। बिस्कुट उगाने का साक्ष्य उसे वहां कभी न कभी मिल जाएगा।

साहब हाकिम से नया ज्ञान पाकर प्रफुल्लित हुए थे। हाकिम ने उनके मन की बात कह दी थी। वैसे भी उन्हें बचपन से ही पुराणों के हर भोजपत्र पर बिस्कुट ही बिस्कुट बिखरे हुए दिखते थे। साहब ने गूगल करके बहुत से समेट भी लिए थे।

उधर भोर की बेला में किसान उठा था। सिपाही हतप्रभ देखते ही रह गए थे और वह सीखचों को पार करता हुआ सड़क पर आ खड़ा हुआ था। उसके पत्थर जैसे शरीर में स्फूर्ति आ गई थी। उसने साहब की मंशा जान ली थी। वह अपने खेत के चारों ओर बाड़ लगाने के लिए निकल पड़ा था। ठीक इसी समय साहब प्राचीन बिस्कुट ज्ञान का घोटा लगा रहे थे। हाकिम की ड्यूटी बजा लाने का वक्त हो गया था।

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