चौपालः मुश्किल चक्रव्यूह


ज्यों-ज्यों नौ अगस्त का दिन नजदीक आ रहा है, बेलारूस के पनचानबे लाख निवासियों का धड़कन तेज होता जा रहा है। उनके मन में सवाल एक ही है। क्या उनके देश पर जो यूरोप की आखिरी तानाशाही होने का धब्बा लगा है, वह धुल पाएगा! पिछले छब्बीस वर्षों से सर्वसत्तावादी एलेक्जेंडर लुकाशेंको का एकतरफा शासन है, जहां विरोध करने और असहमति का कोई स्थान नहीं है। इस बार लगता है कि वहां के तानाशाह मुश्किल चक्रव्यूह में फंस गए हैं। इस बार इनका सामना हो रहा है एक साधारण दो बच्चों की मां स्वेतलाना तिखानोवस्काया से। इनके पति को इसलिए जेल में डाल दिया गया है कि वे सर्वसत्तावाद की आलोचना किया करते थे। स्वेतलाना के सभाओं में भीड़ भी जुटने लगी है। खासकर के महिलाओं की, क्योंकि वर्तमान शासक खुलेआम महिलाओं का विरोध करता है। बेलारूस का कुल आबादी में से 53.5 फीसदी महिलाएं हैं। अगर वे चाह लें तो फिर लुकाशेंको का जाना इस बार तय है।
’जंग बहादुर सिंह, गोलपहाड़ी, जमशेदपुर

विकल्प की ओर
बिहार में पूर्णबंदी की अवधि को 16 अगस्त तक बढ़ा दिया गया है। पश्चिम बंगाल में आंशिक पूर्णबंदी है। यह बात समझ से परे है कि जब कई विशेषज्ञ पूर्णबंदी को अब एकमात्र प्रभावी कदम नहीं बता रहे हैं, तब भी लगातार ऐसे सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। दो महीने की देशव्यापी पूर्णबंदी उस वक्त सही निर्णय थी। इसने कोरोना के प्रसार को धीमा किया। लेकिन अब ऐसे सख्त कदमों से लग रहा है कि राज्य सरकार सिर्फ समस्या को टालने का काम कर रही है, न कि उसे सुलझाने का। इस कोरोना काल में मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने पर होना चाहिए, न कि पूर्णबंदी लगाने पर, क्योंकि विश्व स्वास्थ संगठन ने कहा है कि यह वायरस हमारी जिंदगी से जल्दी नहीं जाने वाला है। दिल्ली इसका अच्छा उदाहरण है।

पूर्णबंदी जैसे कदम पहले से ही डगमगाती अर्थव्यवस्था में रोजी-रोटी की समस्या को पैदा करेगा। यह लोगों में मानसिक अवसाद को बढ़ावा देगा और इससे कई तरह की बीमारियां पैदा होंगी। इसलिए अच्छा होगा कि सरकार का ध्यान स्वास्थ्य संरचना में सुधार पर हो, न कि पूर्णबंदी को एकमात्र उपाय मानने पर।
’मो फैयाज आलम, दिल्ली

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