जरूरत नई रणनीति की


प्रधानमंत्री की तरह मैंने भी पिछले सप्ताह अपना दूसरा टीका लगवाया। लगवाने के बाद मुझे एक सरकारी सर्टिफिकेट दिया गया, जिसके निचले हिस्से में थी प्रधानमंत्री की तस्वीर और ये शब्द- ‘दवाई भी और कड़ाई भी’। उनका संदेश अंग्रेजी में भी था, लेकिन अलग। अंग्रेजी में संदेश था- ‘इकट्ठा मिल कर भारत कोविड-19 को हराएगा’। दोनों संदेश अच्छे हैं, लेकिन उनको पढ़ कर याद आया मुझे कि जबसे इस महामारी ने हमारे देश में पांव रखा है तबसे नरेंद्र मोदी की कोशिश रही है भारतवासियों के सामने साबित करने की कि उन्हीं की शरण में रह कर हम सुरक्षित रहेंगे। महामारी की इस युद्धभूमि में हमारा कवच है अगर कोई तो उनका छप्पन इंच का सीना।

पिछले साल उनके भक्त कहते नहीं थकते थे कि ‘मोदी न होते तो लाशों के ढेर लग जाते हमारे शहरों की सड़कों पर’। इसको मान कर मुख्यमंत्रियों ने अपने कई अधिकार केंद्र सरकार (प्रधानमंत्री कार्यालय) को सौंप दिए चुप करके। सो, टीके लगाने की प्रक्रिया जब शुरू हुई, किसी ने चूं नहीं की जब पूरा कार्यक्रम दिल्ली से चलाया गया। इस गलती के परिणाम पिछले सप्ताह दिखने लगे जब टीकों का अभाव दिखने लगा कई राज्यों में। प्रधानमंत्री ने जब मुख्यमंत्रियों से भेंट की, तो उन्होंने कहा कि हमने पिछले साल कोरोना को जैसे हराया था बिना टीकों के वैसा हम फिर से कर सकते हैं। लेकिन इसके बाद यह भी कहा कि अप्रैल 11-14 के बीच हम वैक्सीन उत्सव मनाएंगे। यह उत्सव कैसे मनाएंगे जब मुंबई जैसे महानगर में कई टीकाकरण केंद्र बंद हो गए हैं वैक्सीन न होने की वजह से? प्रधानमंत्री और देश के स्वास्थ्य मंत्री कह रहे हैं कि वैक्सीन की कोई कमी नहीं है और इस तरह की अफवाहें फैला रहे हैं उनके राजनीतिक दुश्मन। क्या सच का सामना नहीं करना चाहते हैं या वास्तव में उन तक यथार्थ की खबर नहीं पहुंची है?

सच तो यह है कि रणनीति में गलतियां न हुई होतीं तो आज हम भी अमेरिका, इजराइल और ब्रिटेन की तरह गर्व से कह सकते शायद कि अपने आधे से ज्यादा लोगों को टीके लगाने में हम सफल रहे हैं। आज हम बहुत पीछे रह गए हैं। स्थिति इतनी बिगड़ गई है अपने देश में कि न्यूजीलैंड ने पिछले सप्ताह भारतीयों के वहां आने पर पाबंदी लगा दी है। मैं अपने उस महाराष्ट्र के समुद्र-तटीय गांव में वापस लौटने पर मजबूर हूं, क्योंकि मुंबई में तकरीबन पूरा लॉकडाउन हो गया है और फिर से प्रवासी मजदूर इस महानगर से भागने लगे हैं।

मेरे गांव में कई महीनों बाद पर्यटक वापस लौटने लगे थे, लेकिन अब इस गांव में भी कोरोना के मामले पाए गए हैं और तेजी से बढ़ने लगे हैं, सो वही माहौल बन गया है जो पिछले साल था इस महीने में। बाहरी लोगों का आना-जाना शायद कुछ ही दिनों में रोक दिया जाएगा। मैंने जब इस जिले के एक आला अधिकारी से पूछा कि हम टीकाकरण में तेजी क्यों नहीं ला रहे हैं, तो उनका जवाब स्पष्ट था : हमारे पास हैं ही नहीं इतने टीके, जो हम ऐसा कर सकें। इस अभाव का दोष महाराष्ट्र सरकार के प्रवक्ता लगा रहे हैं केंद्र सरकार पर और अब अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री भी ऐसा कहने लगे हैं।

पिछले हफ्ते अदार पूनावाला ने इंडिया टुडे के राहुल कंवल से एक इंटरव्यू में कहा कि उनको अगर वैक्सीन का उत्पादन बढ़ाना होगा तो उनको कम से कम तीन हजार करोड़ रुपयों की सरकारी सहायता की जरूरत है। अदार मालिक हैं सीरम इंस्टीट्यूट के और उनके कारखानों में बनती हैं दुनिया की सबसे ज्यादा वैक्सीन। आक्सफर्ड एस्टरजेनेका की वैक्सीन उनके कारखानों में बन रही है, जो यहां कोविशील्ड के नाम से जानी जाती है। भारत सरकार के कहने पर उन्होंने भारत में इसके दाम इतने कम रखे हैं कि अपने प्रधानमंत्री ने कई बार गर्व से कहा है टीवी पर कि हमारे देश में जितनी सस्ती मिलती है कोरोना की वैक्सीन, किसी और देश में नहीं मिलती है, यह हमारी आत्मनिर्भरता का कमाल है।

रणनीति के पीछे इरादा नेक था शायद, लेकिन अब जब टीके मिल ही नहीं रहे हैं तो क्या होगा? मुंबई में मेरी एक दोस्त अपने अस्पताल में टीकाकरण करवा रही थी भारत सरकार की इजाजत से पिछले हफ्ते तक, लेकिन अब उनको पूरी प्रक्रिया बंद करनी पड़ी है वैक्सीन न होने के कारण। उनका सुझाव है कि जो लोग क्षमता रखते हैं टीकों का पूरा दाम देने की, उनसे पूरे पैसे लेने चाहिए। करोड़ों भारतीय नागरिक हैं जो खुशी से हजार रुपए देकर टीका लगवाने को तैयार हो जाएंगे महनगरों में। रणनीति में दूसरा बदलाव यह करना चाहिए कि टीकाकरण का अधिकार राज्य सरकारों को दे देना चाहिए फौरन, ताकि वे अपनी अलग-अलग रणनीति तैयार कर सकें। महाराष्ट्र सरकार अगर चाहे ज्यादा टीकों की खरीदारी करने की, तो खरीदने की इजाजत मिलनी चाहिए। केंद्र सरकार ने जो पूरी प्रक्रिया को अपने हाथों में रखा है, वह शायद मोदी की रणनीति में सबसे बड़ी गलती साबित होने वाली है।

विदेशी टीकों का आयात भी खोलने की जरूरत है, इसलिए कि इस युद्ध में आत्मनिर्भता का कोई काम नहीं है। इस युद्ध में बल्कि वसुधैव कुटुंबकम् का असली मतलब दुनिया को समझ में आया है। इस युद्ध में सबको एक-दूसरे की सख्त जरूरत है। क्या यही वजह नहीं थी कि हमारे प्रिय प्रधानमंत्री ने अपने लोगों को अनदेखा करके कई हजार टीके उन देशों में भेजे हैं, जिनके यहां वैक्सीन का उत्पादन है ही नहीं। सबसे बड़ा सवाल अब उठने वाला यही है कि कोरोना के खिलाफ इस युद्ध में अगर मोदी ने सारी सफलताओं का श्रेय लिया है, तो इन गलतियों का दोष भी अपने सिर लेने को तैयार होंगे क्या?






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