‘तांडव’ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता


हाल ही में डिजिटल माध्यम के एक मंच पर आई वेब शृंखला ‘तांडव’ पर विवाद अब भी थमने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं। हालांकि इस शृंखला से उन दृश्यों को हटा दिया गया है, जिन्हें लेकर हंगामा चल रहा है। उसके निर्देशक ने इसके लिए माफी मांगी। इस मामले में निर्देशक और अन्य कुछ लोगों को अदालत से अग्रिम जमानत लेनी पड़ी। हालांकि इसके बाद भी कुछ संगठन सिरीज और उसके निर्माताओं के खिलाफ अदालत में जाने की बात कह रहे हैं।

गुरुवार को कई जगहों से इस मसले पर प्राथमिकी दर्ज कराने की खबरें आर्इं। बल्कि उत्तर प्रदेश की पुलिस सिरीज के निर्देशक और लेखक के घर पूछताछ के लिए पहुंची और नहीं मिलने पर नोटिस चिपका दिया। गौरतलब है कि ‘तांडव’ के कुछ दृश्यों को लेकर कुछ संगठनों ने यह आपत्ति जताई कि इससे उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंची है। इसके बाद कई अन्य संगठन भी इसमें कूद पड़े।

दरअसल, किसी फिल्म के कुछ दृश्यों से आस्था के आहत होने या धार्मिक भावना के चोट पहुंचने का यह कोई नया मामला नहीं है। लेकिन हर बार इस तरह के मौके पर यह सोचने की जरूरत महसूस होती है कि कला माध्यमों में किसी विषय की अभिव्यक्ति की सीमा क्या है और क्या उसे नियंत्रित किया जाना चाहिए। अगर किसी फिल्म में धार्मिक भावनाओं के आहत करने के मकसद से कोई दृश्य परोसा गया है तब उसकी व्याख्या होनी चाहिए और उसे उसके दर्शकों के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे फिल्म के बारे में क्या राय रखते हैं।

इस तरह से कोई समाज अपनी लोकतांत्रिकता भी बचा लेता है और अपनी समझ को और ज्यादा स्पष्ट बनाता है। मगर विडंबना यह है कि इस तरह के विश्लेषण से गुजरने के बजाय कुछ संगठन सीधे ही आपत्ति और विरोध का झंडा उठा लेते हैं, हिंसक रुख अख्तियार कर लेते हैं और इस तरह विचार और विश्लेषण की किसी भी प्रक्रिया में लोगों के जाने की गुंजाइश खत्म कर देते हैं। जबकि यह प्रक्रिया किसी भी व्यक्ति और समाज को परिपक्व बनने में मददगार होती है।

बहरहाल, इस विवाद के बाद अब संभव है कि सरकार इस तर्क पर फिल्में और दूसरी सामग्री डिजिटल मंचों पर लोगों को मुहैया कराने वाले माध्यम में दखल दे कि किसी को अराजक तरीके से कोई चीज दिखाने की एक सीमा है। मगर सवाल है कि अगर यह रास्ता आगे बढ़ा तो नियंत्रण की यह सीमा कहां तक जा सकती है। जहां तक अदालत का सवाल है, तो करीब तीन दशक पहले ही एक फिल्म ‘ओरे ओरु ग्रामाथिले’ के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में अपना फैसला दिया था। अफसोस की बात यह है कि हमारा जो समाज अब तक अलग-अलग विचारों का संगम रहा है और यही हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती रही है, उसमें अब अभिव्यक्तियों के सामने कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

कला-माध्यमों में किसी विषय-वस्तु को संप्रेषित करने के लिए जिन बिंबों और प्रतीकों का सहारा लिया जाता है, उसका मकसद आमतौर पर आस्था या धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना नहीं होता है। लेकिन अगर कभी किसी को ऐसा महसूस होता भी है तो इसका सबसे बेहतर समाधान विवेक और समझदारी के साथ विषय पर बहस और विचार करना है। यह एक दीर्घकालिक विचार-प्रक्रिया की भी शुरुआत करता है। विडंबना यह है कि इसके बजाय बहुत सारी जरूरी बातें हंगामे और शोर में दब कर रह जाती हैं और उन पर लोगों को सोचने और अपने विवेक के आधार पर राय बनाने में मदद नहीं मिलती है।

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