दायरे में अभिव्यक्ति


किसी भी लोकतांत्रिक समाज और देश की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वहां वैचारिक सहमति और असहमति को अभिव्यक्त करने की आजादी एक अधिकार के रूप में स्वीकार्य हो। लेकिन कई बार देखा जाता है कि अभिव्यक्ति की निर्बाध आजादी का इस्तेमाल कुछ लोग इस तरह करने लगते हैं जिससे भावनाओं के भड़कने और यहां तक कि अराजकता फैलने की आशंका खड़ी हो जाती है।

खासतौर पर जब से सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों का विस्तार हुआ है, उस पर अपनी राय जाहिर करने की सुविधा तक बहुत सारे लोगों की पहुंच बनी है, तब से एक बड़ी आबादी को अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए एक नया आाकाश जरूर मिला है, लेकिन इसके बरक्स ऐसे तमाम लोग भी हैं, जो इन मंचों का इस्तेमाल अपनी कुत्सित मंशा को पूरा करने के लिए करने लगे हैं।

ऐसी घटनाएं अक्सर दर्ज की गई हैं, जो महज एक व्यक्ति के आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर फैलाए गए भ्रम के चलते होती है और उसमें नाहक ही जानमाल का नुकसान हो जाता है। विडंबना यह है कि सोशल मीडिया के मंचों पर ऐसी हरकतें करने वाले लोगों की वजह से कभी झूठी धारणा तो कभी अराजकता फैल जाती है, लेकिन इसके नुकसानों की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता है।

शायद इसी के मद्देनजर केंद्र सरकार ने गुरुवार को अगले तीन महीने में एक कानून लाने की घोषणा की है, जिसके जरिए डिजिटल माध्यमों पर सामग्रियों को नियमित किया जा सकेगा और इसके लिए जिम्मेदारी तय की जा सकेगी। सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया गलत तस्वीर दिखाने को लेकर लगातार शिकायतें आ रही थीं; चूंकि अपराधी भी इसका इस्तेमाल करने लगे हैं, इसलिए ऐसे मंचों से संबंधित एक नियमित तंत्र होना चाहिए।

अब सरकार ने सोशल मीडिया के नियमन से संबंधित जो दिशानिर्देश लाने की बात कही है, उसके मुताबिक फेसबुक या ट्विटर जैसे किसी भी मंच को शिकायतों पर विचार करने के लिए अफसरों की तैनाती करनी होगी और आपत्तिजनक सामग्री को चौबीस घंटे के भीतर हटाना होगा। अफवाह फैलाने वाले पहले व्यक्ति की पहचान करके उसकी जानकारी देनी होगी। साथ ही ओटीटी प्लेटफार्म या डिजिटल मीडिया को भी अपनी सामग्री तैयार करने के बारे में बताना होगा। इसके अलावा, कई अन्य बिंदु दिशानिदेर्शों में शामिल किए गए हैं, जिनका मकसद सरकार के मुताबिक अवांछित मनमानीपन और अराजकता पर लगाम लगाना है।

दरअसल, आज सोशल मीडिया के साथ-साथ अभिव्यक्ति के दायरे का जो विस्तार हुआ है, उसमें बहुत सारे लोगों को अपने विचार को सार्वजनिक रूप से साझा करने का मौका मिला है। मुश्किल यह है कि इन्हीं मंचों पर कुछ असामाजिक तत्त्व भी कई बार नफरत और हिंसा फैलाने के मकसद से अफवाह फैला देते हैं। ऐसे लोग आमतौर पर पकड़ में नहीं आते।

निश्चित तौर पर ऐसे लोगों की पहचान करने और उनके खिलाफ साइबर कानूनों के तहत कार्रवाई सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि इस प्रवृत्ति के लोगों की वजह से वाजिब अभिव्यक्ति की आजादी प्रतिबंधित नहीं की जानी चाहिए। गलत को परिभाषित करने का अधिकार अगर कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित किया जाएगा तो इसका भी दुरुपयोग संभव है।

अगर सरकार सोशल मीडिया और ओटीटी मंचों पर होने वाली गतिविधियों को नियमित करने जा रही है तो उसे इस बात का खयाल रखना चाहिए कि इसके नाम पर नियंत्रण की कोई ऐसी व्यवस्था नहीं खड़ी हो जाए, जो लोकतंत्र को सीमित या बाधित कर दे। एक विचार से सहमति-असहमति की प्रक्रिया और उसके प्रति सहिष्णुता किसी व्यक्ति या समाज को उदार बनाती है, उसमें लोकतांत्रिक मूल्यों का विस्तार करती है और इस तरह मानवीय संवेदनाओं की बुनियाद मजबूत होती है।

 






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