दुनिया मेरे आगेः गुम होती मासूमियत


मोनिका भाम्भू कलाना

यह कुछ समय पहले की बात है जब सब कुछ सामान्य चल रहा था। अपने बेटे को पिता ने गाड़ी से उतारा और विद्यालय की अध्यापिका को सौंपा। वह बच्चा बेतहाशा रो रहा था। हर स्थिति की अपनी मजबूरी होती है। पिता भी बहुत देर तक कोमल नहीं बने रह सकते थे। उन्होंने मुंह मोड़ लिया और बच्चा रोते हुए ही स्कूल में चला गया। मैं देख रही थी। मुझे लगा यह जिंदगी का पहला पाठ है कि अब तुम्हारी यात्रा में सहयात्री अध्यापक और सहपाठी ही हो सकते हैं। बाकी अकेले ही चलोगे तुम अब से..!

मैं अपने घर में अपने कमरे के कोने से हर रोज विद्यालय जाते हुए बच्चों को देखती थी। सुबह-सुबह कितनी मुश्किल से ‘स्वर्ग’ की यात्रा में तल्लीन मासूम अपने सपने छोड़ दुनियावी उम्मीदों की तरफ रुख करते हैं। तब कितनी रोनी सूरत लगती है उनकी। उनको देख कर लगता है और यह सवाल बार-बार कचोटता है कि क्या अध्यापक बचपने को मारने वाला हथियार भी है! विद्यालय जाना दुनिया के सबसे उबाऊ और कठिन कामों में से एक क्यों बन गया है? विद्यालय के परिसर ऐसे क्यों नहीं बन पाए कि बच्चा जैसे चहकते हुए अपनी पसंद की जगहों पर जाने की जिद करता है, वैसे ही वह स्कूल की ओर दौड़ पड़े..!

आज हालत यह है कि सचमुच पीठ पर लटके भारी थैलों से ज्यादा बच्चों के लटकते चेहरे देख कर रोना आने लगता है। कुछ देशों में नियम है कि सात साल से छोटे बच्चों का प्रवेश विद्यालयों में नहीं हो सकता। ये वही देश है जो मानवाधिकार पर तैयार तमाम रिपोर्टों में हमेशा शिखर पर रहते हैं। दूसरी तरफ हम हैं, जहां दो वर्ष के बच्चे को भी विद्यालय धकेलने की तैयारी शुरू हो जाती है। कम से कम सरकारी नियमों के स्तर पर बच्चे पहले छह साल की उम्र तक इस जंजाल से बचे हुए थे। अब तो नीतिगत स्तर पर भी तीन साल के बच्चे को औपचारिक शिक्षा और स्कूल परिसर में बांधने की व्यवस्था हो रही है! क्या यह प्रतिस्पर्द्धा में पिछड़ने का डर हमसे करवाता है या अपने बच्चों के लिए हमारे पास वक्त नहीं है? इस प्रचार पर एक विश्लेषण और अध्ययन होना चाहिए कि अंकों की होड़ में झोंक दिए जाने वाले बच्चों में से ज्यादा और कम अंक हासिल करने वाले बच्चों ने अगले दस या बीस सालों में क्या मुकाम हासिल किया!

मेरे छोटे भाई ने इसी साल स्कूली पढ़ाई पूरी की है। घर के एक बहुत छोटे बच्चे को देख कर वह कहता है कि मुझे चिंता होती है… मैंने जैसे-तैसे रो-धोकर, छुट्टियों का इंतजार कर-करके विद्यालय पार कर लिया, लेकिन यह तो अभी ही जाने लगा! कैसे करेगा! मुझे सिर्फ उसी बच्चे को नहीं, बल्कि हर विद्यार्थी को देख कर यही सवाल घेरता है। दिखने में आधुनिक लगने वाली और प्रयोग करती दिखती यह जड़ हो चुकी व्यवस्था कितने और बच्चों के बचपन को बगैर गुनाह के ऐसी सजा देगी?

जब हमारे विद्यालयों का वातावरण हम बदलने में सफल नहीं रहे तो किसने हक दिया हमें कि हम मासूमियत का कत्ल करके उस पर तनाव, फिक्र और मशीनी-सा एक चेहरा थोप दें? जब कुछ रचनात्मक करने-कराने की हमारी सामर्थ्य नही, तो कौन-से अधिकार से हम बच्चों पर दिन-रात रटने और किताबों में घुसे रहने की पद्धति को थोप रहे हैं? जब मिट्टी से संसार बुन लेने के सपनों को हम धरातल नहीं लेने देते, उनकी कल्पनाओं के पंखों की उड़ान को पूरा नहीं होने देते, बेवजह मुस्कुराने की उनकी अदा को अपनी तुच्छ गंभीरता से तौल कर महत्त्वहीन साबित करते हैं, तो उनकी जिंदगी से इतना निकृष्ट खेल खेलने वाले हम होते कौन हैं? उनके भविष्य को संवारने के पागलपन में उनके वर्तमान को इस तरह खत्म करने का अंदाज! यह किस तरह का प्रयोग है?

विद्यालय से लौटते हुए बच्चे घर पहुंचने तक के रास्ते में जितनी प्रफुल्लता से रहते हैं, किसी भी तरीके से उस भाव को हम स्थायी बना सकते हैं? अंकों की दौड़ से ही मनुष्यता का निर्धारण करने की अपनी सभ्यता में हम आत्मग्लानि में डूबे अरबों बच्चों को प्रेरणा तक ला सकते हैं? अपने ही मां-बाप के भेदभावपूर्ण रवैये से कमतर होने की हीन भावना से ग्रस्त बच्चों को हम उनकी क्षमता का बोध कराने में सक्षम हैं? सवालों की शृंखला इतनी लंबी है, जो कई बार रोके नहीं रुकती है। समूचे परिदृश्य में फैली और नई जटिलताएं लिए और बदहाल होती इस तस्वीर के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? नौनिहालों के मुंह पर दिनोंदिन गहराती तनाव की रेखाएं कितने प्रश्न करती हैं हर एक से! क्या उनका कोई जवाब तलाश पाएंगे हम? या यह आनुवंशिक हो गया है, जिसे लगातार चलते ही रहना है?

कितना मुश्किल है यह सब, लेकिन नामुमकिन नहीं। किसी मौके पर और अपने काम करने की सीमा में अगर कोई एक बच्चा भी मुस्कुरा सका तो बचपन मरेगा नहीं। अपने स्तर पर इतना प्रयास तो बनता ही है।

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