नेतृत्व के गुणों का बीजारोपण जरूरी


राधिका नागरथ

जिंदगी सजगता मांगती है और हम आनंद में खोना चाहते हैं, खुशी में डूब जाना चाहते हैं, तो बात कैसे बने। सजग वही रह सकता है जो बलिष्ठ है, बलवान है। आध्यात्मिक मार्ग पर चलना कायरों का काम तो है नहीं, जिसमें दम हो, जीवन की कठिनाइयों को सहने की क्षमता हो, वही धीर पुरुष इस मार्ग को चुनता है। तैत्तिरीय उपनिषद में आया है कि जो बलवान है जिसके पास दृष्टि है, वही अपनी और राष्ट्र की रक्षा कर सकता है।

इसलिए स्वयं ही अपने नेता बनो अपने अंतर्मन से अपने भीतर नेतृत्व के गुणों का बीजारोपण करो। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि उनके जीवन में एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि उनके अंतर्मन ने उन्हें इंद्रिय सुख में खींचा हो या काम के प्रति आकर्षण हुआ हो। हम आम व्यक्ति तो उसी रूप, रस, शब्द, स्पर्श और गंध इन पांच इंद्रियों के इशारे पर नाचते हुए जीवन बिता देते हैं। और फिर अधूरी इच्छाओं को पूरा करने के लिए बार-बार शरीर पाते हैं और पुनर्जन्म के बंधन में बंधे रहते हैं।

चिन्मय मिशन के स्वामी तेजोमयानंद बताते हैं कि रोजमर्रा और आवश्यक कार्यों में हमेशा अति महत्त्वपूर्ण कार्य को चुनो। मतलब रोजमर्रा के काम और जो अत्यंत आवश्यक और आकस्मिक हो और उसमें से भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण को चुनो। अगर आम भाषा में बात करें तो इसका मतलब रोजमर्रा कि हमारी जिंदगी में जब कोई आकस्मिक कार्य आए, तो हम स्वत: ही आकस्मिक को प्राथमिकता देते हैं। जबकि चुनाव हमेशा महत्त्वपूर्ण का करना चाहिए। अक्सर हम महत्त्वपूर्ण को भूल जाते हैं और रोजमर्रा के क्रियाकलापों में ही उलझे रहते हैं।

वेद में आया है कि शतं विहाय भोक्तव्यं सहस्रं स्नानमाचरेत्। लक्षं विहाय दातव्यं कोटिं त्यक्तवा हरिं भजेत्।। सौ कार्य को छोड़कर भोजन करना चाहिए। हजारों कार्य को छोड़कर स्नान करना चाहिए। लाखों कार्य को छोड़कर दान देना चाहिए और करोड़ों कार्य को छोड़कर परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए। आध्यात्मिक आनंद की भी आदत पड़ जाती है, कई बार लोगों को ध्यान के बिना नींद नहीं आती। ध्यान में भी रस आने लगता है जिसके बिना रहा नहीं जाता। फिर भी यह अच्छी आदत है।

सुंदर भक्ति गान सुनकर सोना भी अपने आप में भोग हैं, लेकिन बुरा नहीं है। पर अगर हमारी कोशिश यह होगी कि बिना किसी आलंबन के सो सके तो यह बहुत अच्छा प्रयास है। और यह तभी हो सकता है जब हम हर वक्त आनंद में रहने की आदत डाल ले, जो हमारा वास्तविक स्वरूप है। जब यह अनुभव पक्का हो जाता है कि मैं नहीं कर रहा हूं बल्कि कार्य मेरे द्वारा हो रहा है तो फिर कुछ खोने पर ज्यादा दुख या पाने पर ज्यादा खुशी अनुभव नहीं होती, एक सा रहता है निजानंद।

स्वामी अनुभवानंद कहते हैं कि यह सजगता पूर्ण जीवन धीरे-धीरे बनेगा। पहले भौतिक संसार से आनंद लेने की आदत छूटेगी, तो प्रभु भक्ति में मन लगने लगेगा या ध्यान में रस आने लगेगा और धीरे-धीरे अपने अंदर के आनंद की आदत पड़ेगी। और जब उस मूल आनंद के स्रोत से जुड़ जाते हैं तो फिर बाहरी किसी क्रिया या संगीत या ज्ञान की आवश्यकता नहीं रह जाती, आनंद स्वयं अंतर स्फुरित होने लगता है।






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