बचपन का जीवन


कुंदन कुमार

एक विज्ञापन के प्रचार में एक फोटोग्राफर कह रहा था कि ‘बचपन कभी लौट कर नहीं आता… इसे हमारे साथ सहेजिए’। उसके कहने का निहितार्थ बिल्कुल स्पष्ट था। विज्ञापन के माध्यम से भले वह अपने वृत्ति का प्रचार कर रहा हो, मगर उसके शब्दांश का प्रथम भाग बचपन के महत्त्व को स्पष्ट करता है। जिस प्रकार बीता हुआ समय वापस नहीं हो सकता, ठीक उसी प्रकार हमारे शरीर की जो भौतिक अवस्था खत्म गई, वह कभी वापस नहीं आ सकती। मसलन, हमारे जीवन में वसंत तो बार-बार आता है, लेकिन बचपन, जवानी और बुढ़ापे का वसंत बीत जाने पर दोबारा नहीं आता।

यही वजह है कि फोटोग्राफी के माध्यम से हम अपने जीवन के अनमोल लम्हों को सहेज कर रखना चाहते हैं। जब भी हम किसी पारिवारिक या सार्वजनिक समारोह में सम्मिलित होते हैं तो फोटो खिंचवाना या अपने मोबाइल से सेल्फी लेना नहीं भूलते हैं। मोबाइल खो जाने पर या किसी फोटो की फाइल के खो जाने पर हमें दुख इसलिए होता है कि उसमें हम अपने जीवन के महत्त्वपूर्ण लम्हों को फोटो के रूप में सजा कर रखते हैं।

पहले जब अत्याधुनिक कैमरे से लैस मोबाइल फोन प्रचलन में नहीं था तो कैमरे में फोटोग्राफर हमारी तस्वीरें लेकर हमें देता था, जिसे हम एल्बम में सजा कर सुरक्षित रखते थे। मतलब स्पष्ट है। बच्चे या किशोर अपना फोटो खिंचवा कर रख लें और आगामी जीवन में जब चाहे तब उसे देख कर यह अनुभव करें कि मैं बचपन में ऐसा, इतना सुंदर और प्यारा लगता था। आज भी जब कभी-कभार घर में साफ-सफाई के दौरान आलमारी से फोटो का एल्बम निकलता है तो हमारे अंदर यादों की तरंगें गोता लगाने लगती हैं।

बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था सापेक्ष तो है ही, क्योंकि लोक हमें इसी रूप में देखता है, मगर प्रभाव बहुत कुछ मानसिक स्थिति पर निर्भर रहता है। अवस्था का हिसाब लगाने और उसकी गणना करने के लिए हमने बुद्धि के अनुसार वर्ष, मास, पक्ष, सप्ताह, दिन, रात, घड़ी, घंटा आदि का निर्धारण कर रखा है। हम अपने बचपन को स्थायी संपत्ति बना सकते हैं, इसके लिए हमें कुछ विशेष नहीं करना है। बस अपनी मानसिकता को बचपने की अवस्था के अनुकूल ढालने की जरूरत है।

अगर हम ऐसा करने में सफल रहते हैं तो हमें न बचपन की पुरानी फोटो देखने की आवश्यकता पड़ेगी और न बच्चों के बीच जाकर बचपन बटोरने की जरूरत होगी। हम खुद बालकोचित उत्साह और ऊर्जा द्वारा प्रेरित रह कर जीवन को अनेक वर्षों तक सार्थक एवं उपयोगी बनाए रख सकते हैं।

बचपन के संदर्भ में ‘इंजील’ में लिखा है- ‘अगर स्वर्ग में पहुंचने की इच्छा है तो पहले बालक बनो।’ इसी तरह, एडन मिलै नामक विचारक की मानें तो ‘बचपन वह सम्राज्य है, जहां किसी की मृत्यु नहीं होती।’ बालक बने रहने का अर्थ नासमझ या नाबालिग बने रहना नहीं है, बल्कि समझ और बौद्धिकता को मन के उपर बोझ के रूप में धारण करने के स्थान पर बालकोचित सरलता के साथ सर्वसुखदायी सरलता के रूप में प्रवाहित या नि:सृत करना है।

एडन मिलै प्रश्नोत्तरी शैली में लिखते हैं कि ‘क्या तुम जानते हो कि बालक होने का क्या अर्थ होता है? बालक होने का अर्थ प्रेम में विश्वास करना और विश्वास में विश्वास करना है।’ बचपन की हमारी सबसे बड़ी सीख यही है कि बचपन ने हमें विश्वास करना सिखाया है। जिद्दी बन कर अपने लक्ष्य को हासिल करना बचपन की सीख है।

महात्मा गांधी हमेशा कहते थे कि सत्य-अहिंसा का पाठ मैंने बच्चों से सीखा है। बचपन में हर कोई निष्कपटी, निस्वार्थी, सत्यवादी और अहिंसा का पुजारी होता है। लेकिन जैसे-जैसे हम बचपन से युवावस्था की ओर बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे हमारी इच्छाएं, आवश्यकताएं और महत्त्वाकांक्षा बढ़ती जाती है। अपनी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए हम झूठ, फरेब, हिंसा, बेईमानी और अन्य विकृतियों की ओर बढ़ते चले जाते हैं। संभव है, अगर हम बचपन की मानसिकता में जीवन-यापन करते रहें तो प्रौढ़ावस्था तक मानसिकता विकृतियां हमें छू भी न पाएं। शोध से पता चला है कि बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा होती हैं, इसलिए वे जिज्ञासु प्रवृत्ति के होते हैं।

बच्चों की तरह जो जिज्ञासु है, वह सदैव ज्ञानार्जन करेगा और क्रियाशील बना रहेगा। जो व्यस्त व्यक्ति को तो अनुभव ही नहीं होता कि दिन कब व्यतीत हो गया। जो निष्क्रिय है, उनके लिए दिन का चौबीस घंटा भी चौबीस महीनों के बराबर होता है और दिन काटे नहीं कटता। जिस तरह सुबह दिवस को इंगित करता है, उसी प्रकार बालक मनुष्य का निदर्शन करता है।

किसी ने ठीक ही कहा है कि अगर किसी व्यक्ति या व्यक्ति अथवा राष्ट्र को समाप्त करना है तो उसका बचपन उससे ले लो। समय से पहले वयस्क होने की चाहत कहीं न कहीं बचपनेपन के भोलेपन की निर्मम हत्या कर रहा है। बचपन ही जीवन का वास्तविक सौंदर्य है। इसलिए जीवन का सौंदर्य आजीवन बना रहे, इसके लिए बचपन की सलामती जरूरी है। बच्चों वाली मानसिकता अपना कर हम अपने जीवन में हमेशा खुश और चिंतामुक्त रह सकते हैं।

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