बनी रहे मुस्तैदी


देश में टीकाकरण अभियान रफ्तार पकड़ने लगा है। सोमवार को पिच्यासी लाख पंद्रह हजार लोगों को टीका लगाया गया। यह अब तक का रेकार्ड है। इससे पहले एक ही दिन में इतने टीके नहीं लगे थे। एक अप्रैल को अड़तालीस लाख लोगों को टीका लगा था। वैसे पिछले कुछ दिनों में टीकाकरण का रोजाना का औसत पैंतीस लाख के आसपास ही रहा। इससे ऊपर नहीं निकल पाया।

ये आंकड़े निराशाजनक इसलिए भी थे कि सरकारों के तमाम दावों के बावजूद टीकाकरण का काम जोर नहीं पकड़ पा रहा था। एक दिन में पिच्यासी लाख से ज्यादा लोगों को टीका लगाने से यह भी साबित हो गया कि हम चाहें तो टीकाकरण की अपेक्षित रफ्तार हासिल सकते हैं और दिसंबर तक अधिकतम आबादी को टीका लगा सकते हैं। लेकिन ऐसा हो कैसे पाएगा, यह सवाल अभी भी है। अब तक का अनुभव यही है कि ऐसे अभियानों की शुरुआत तो जोरशोर से हो जाती है, पर धीरे-धीरे सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौटता दिखने लगता है। इसलिए अब जरूरत इस बात की है कि सोमवार से जो अभियान शुरू हुआ है, उसकी गति मंद न पड़ पाए।

एक पखवाड़े पहले केंद्र सरकार ने टीकाकरण की नई नीति लागू की थी। इस नीति के तहत अठारह साल से ऊपर वाले सभी लोगों को मुफ्त में टीका देने का एलान किया था। साथ ही टीकाकरण अभियान की कमान भी केंद्र ने अपने हाथ में ले ली थी। इसलिए अगर यह कहा जाए कि सोमवार को पिच्यासी लाख से ज्यादा लोगों का टीकाकरण नई नीति की सफलता का संकेत है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए।

यह कहने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जनवरी से अब तक टीकाकरण अभियान सरकारी तंत्र की अदूरदर्शी नीतियों, लापरवाही और कुप्रबंधन का शिकार बना रहा। वरना क्या कारण है कि जो कामयाबी हम छह महीने में हासिल नहीं कर पाए, वह एक ही दिन में कर ली। जबकि वही व्यवस्था है, वही तंत्र है और काम करने वाले भी वही लोग हैं। हालांकि टीकाकरण में सबसे बड़ी अड़चन टीकों की कमी को लेकर आई। लंबे समय तक यही तय नहीं हो पाया कि टीकों की खरीद कैसे और कौन करेगा। टीकों के आवंटन को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच जम कर राजनीति चली। राज्य केंद्र पर टीके देने में भेदभाव करने का आरोप लगाते रहे, तो केंद्र सरकार राज्यों को नाकाम साबित करती रही। टीकों की खरीद को लेकर सरकारें जिस तरह की उलझन में पड़ी रहीं, वह कम हैरान करने वाली बात नहीं है।

महामारी का खतरा अभी टला नहीं है। दूसरी लहर की भयावहता कम भर हुई है। अब ज्यादा चिंता तीसरी लहर के खतरे को लेकर है। इसलिए हर स्तर पर पुख्ता तैयारियों की जरूरत है। टीकाकरण इनमें सबसे प्रमुख है। अब तक के शोधों से यह सामने आया भी है कि टीका लगने के बाद संक्रमण से काफी हद तक बचाव हो जाता है। इसीलिए टीकाकरण पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सरकार ने रोजाना एक करोड़ लोगों को टीके लगाने का लक्ष्य रखा है। ऐसी भी खबरें हैं कि सोमवार के टीकाकरण अभियान में भाजपा शासित राज्यों का योगदान सत्तर फीसद रहा, जबकि गैर-भाजपा शासित राज्यों में यह तीस फीसद के आसपास ही रहा। हालांकि ऐसा क्यों हुआ होगा, यह तो बाद में ही पता चलेगा। टीकाकरण का अभियान तो तभी सफल हो पाएगा जब इसे राजनीति से ऊपर उठ कर चलाया जाएगा। सवाल भाजपा या गैर-भाजपा शासित राज्य का नहीं होना चाहिए, बल्कि हर राज्य को इस अभियान को सबसे महत्त्वपूर्ण मानते हुए आगे बढ़ना चाहिए।






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