योग दर्शन: वैराग्य और मोक्ष


डॉ. वरुण धीर

मुक्ति के चार साधन हैं जिसे साधन चतुष्टय कहा गया है। साधन चतुष्टय में वैराग्य का दूसरा स्थान है। मुक्ति प्राप्त करने के लिए वैराग्यवान होने और राग-द्वेष को त्यागने के लिए कहा जाता है। व्यक्ति की तृष्णा कभी नहीं मरती है, उसे जितना मिल जाए उसमें संतुष्टि नहीं होती है। हमेशा और अधिक की लालसा मन में बनी ही रहती है।
न संसारोत्पन्नं चरितमनुपश्यामि कुशलं विपाक: पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशत: ।
महाद्भि: पुण्यौधैशिचर परिगृहीताश्च विषया महान्तो जायन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम्॥

संसार में कहीं सुख नहीं है। राजा हो या भिखारी, सभी भीतर से दुखी हैं । पुण्य कर्मों को करने के बाद जो फल मिलता है वह आरंभ में तो सुखकारक होता है लेकिन अंत में भोगने के बाद दुख का कारण बनता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि जो अक्षय अनंत सुख है, जो कभी नष्ट नहीं होता अर्थात जो ईश्वर को प्राप्त करने पर ही मिलता है, उस सुख के लिए वैरागी होकर प्रयास करना चाहिए। जन्म से लेकर मृत्यु तक जब तक यह शरीर है सुख और दुख तो सदैव आते जाते रहेंगे। सत्य यह है कि न तो दुख ही हमेशा बना रहेगा और ना ही सुख हमेशा बना रहेगा।

तृष्णा को पूरा करने के लिए मनुष्य ने पृथ्वी खोद डाली, पर्वतों की खाक छानी कि कहीं दबा हुआ खजाना मिल जाए, समुद्र की गहराई नापी कि कहीं हीरे-मोती मिल जाएं। पर मनुष्य को हर जगह से निराशा मिली। आत्मा शरीर छोड़ने को तैयार है लेकिन तृष्णा तब भी पीछा नहीं छोड़ती है।
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता
स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ता:
कालो न यातो वयमेव याता
स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा

भोगों को हमने नहीं भोगा बल्कि भोगों ने हमें भोगा है। जीवन में जितना समय निकलता जाता है उतना ही ज्ञान और अनुभव भी बढ़ता चला जाता है। हमारी पांचों ज्ञानेंद्रियों ने जीवन भर अपने अपने विषय को अत्यधिक भोग है। जिह्वा ने पूरे जीवन स्वादिष्ट पकवान खाएं हैं। फिर भी कुछ और चाहिए और अधिक स्वादिष्ट चाहिए। इस तरह वह संतुष्ट नहीं हुई। उसी तरह से अन्य इंद्रियां भी अंत तक संतुष्ट नहीं होती हैं। हमने कोई तप नहीं किया बल्कि तप ने हमें तपा दिया। समय नहीं बीता लेकिन हम स्वयं बीत रहे हैं। ऐसे ही तृष्णा बुढ़ी नहीं हुई हम ही बूढ़े हो गए हैं। लिहाजा संतोष से जो सुख मिलता है वह सबसे उत्तम है और उसी को मोक्ष सुख कहते हैं। आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, मनुष्य भले मर जाता है।
माया मरी न मन मरा मर मर गए शरीर
आशा तृष्णा ना मरी कह गए दास कबीर

दिलचस्प है कि मनुष्य को छोड़कर प्रत्येक जीव को कोई विशेष परिश्रम करने की अधिक आवश्यकता नहीं है जीवन को चलाने के लिए। लेकिन जो मनुष्य बुद्धिबल से मोक्ष प्राप्त कर सकता है उसकी जीविका ऐसी बनाई है कि उसकी सारी खोज में ही उसके सारे गुण तिरोहित हो जाते हैं। सबसे अधिक कठिन जीवन भी मनुष्य का ही है। कुछ भी प्राप्त करने के लिए उसे अत्यधिक बुद्धि तथा परिश्रम की आवश्यकता रहती है और सफलता मिलेगी यह भी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए अभ्यास और वैराग्य की नाव पर चढ़कर संसार चक्र से मुक्त हुआ जा सकता है। जो व्यक्ति विवेकी तथा त्यागी है, वही वैरागी हो सकता है। भले-बुरे की पहचान कर निर्णय करके जो सत्य-असत्य जानता हो तथा उसमें से सत्य आचरण को अपनाए और असत्य आचरण का त्याग करे, वही वैराग्यवान हो सकता है।

दुर्गुणों को त्याग कर राज्यपालन, प्रजापालन तथा गृहस्थ कर्म आदि धर्मानुकूल करता हुआ मनुष्य भी योगी और विरक्त हो सकता है। लेकिन झूठे सुख की इच्छा से आलसी व निष्पुरुषार्थी होकर, केवल कपड़े रंग कर, सिर मुंडवा कर, वैरागी का वेश मात्र धारण कर लेने से वैराग्य प्राप्त नहीं हो सकता है। वैराग्य तो केवल ज्ञान तथा अनुभव से ही प्राप्त होता है। प्रत्येक वस्तु का भोग तो किया जाए लेकिन अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए।

मनुष्य को जीवनयापन करने के लिए सभी भोग भोगने पड़ते हैं लेकिन इन भोगों को भोगने के बाद जो चित्त में संस्कार पैदा होते हैं और फिर राग-द्वेष का चक्कर चल पड़ता है। जब तक वैराग्य की प्राप्ति नहीं होगी तब तक ईश्वर का साक्षात्कार नहीं होगा। परमात्मा बिना कर्म के फल नहीं देता और जिस सुख को हम प्राप्त करना चाहते हैं वह परमात्मा के आश्रय में ही संभव है। अनंत गहरे सुख को पाने के लिए छोटे-मोटे कर्म से काम नहीं चलेगा जो सुख चिरस्थायी है, जन्म मरण के बंधन से मुक्त कर दे, उसको पाने के लिए अत्यंत पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। जितना बड़ा सुख उतना ही बड़ा कर्म भी चाहिए और यह चक्कर एक जन्म का नहीं है। मोक्ष का फल अनेक जन्मों के परिश्रम के बाद मिलता है लेकिन वह मोक्ष का जन्म वतर््ामान जन्म भी हो सकता है।

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