राष्ट्रप्रेम का ओजस्वी स्वर सुभद्रा कुमारी चौहान


हिदी काव्यधारा के विकास में जिस दौर की कविताओं ने देश-समाज के बीच ऐतिहासिक तौर पर एक जागरूक हस्तक्षेप के तौर पर कार्य किया, उसमें राष्ट्रीय भावबोध से ओतप्रोत कविताएं लिखे जाने का दौर सबसे अहम है। हिंदी मन को नवजागरण तक ले जाने वाले कवियों के बीच सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं की चर्चा करें तो इनकी लोकप्रियता आज तक बहाल है। यह किसी रचनाकार की स्वीकृति के लिहाज से बड़ी बात है कि वह अपने शब्दों के साथ सर्वकालिकता का यश प्राप्त करे।

अलबत्ता यह थोड़ा दुर्भाग्यपूर्ण जरूर रहा कि हिंदी आलोचना ने उनके कृतित्व के मूल्यांकन में अपेक्षित दिलचस्पी नहीं दिखाई। प्रसिद्ध कवि गजानंद माधव मुक्तिबोध ने जरूर उन पर लिखा पर उनके कृतित्व के साथ उनके दुस्साहसिक व्यक्तित्व के बारे में सम्यक मूल्यांकन का कार्य अब भी शेष है।

मुक्तिबोध ने लिखा है कि सुभद्रा कुमारी चौहान साधारण महिलाओं की आकांक्षाओं और भावों को व्यक्त करती हैं। खासतौर पर बहन, माता, पत्नी के साथ-साथ एक सच्ची देशसेविका के भाव उन्होंने जिस तरह व्यक्त किए, वह अनुपम और दुर्लभ है। उनकी शैली में वही सरलता, अकृत्रिमता और स्पष्टता है, जो उनके जीवन में है।

कमाल की बात यह है कि सुभद्रा जी का जीवनकाल बहुत छोटा रहा पर इस कम समय में भी वो सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में जिस निष्ठा और कर्मठता के साथ उतरीं, वह अप्रतीम है। एक ऐसे समय में जब सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी को लेकर बहस और मुहिम दोनों को तार्किक मुकाम तक पहुंचाने के लिए कई स्तरों पर संघर्ष चल रहे हैं, यह देखना खासा दिलचस्प है कि आजादी के चार दशक पूर्व जन्म लेने वाली भारत की एक बेटी अपने देश के लिए कलम उठाती है और घर से बाहर निकलकर आंदोलनों में शिरकत करने का साहसिक फैसला करती है।

1922 का जबलपुर का झंडा सत्याग्रह देश का पहला सत्याग्रह था और सुभद्रा जी पहली महिला सत्याग्रही के तौर पर इसमें शरीक हुई थीं। लक्ष्मण सिंह चौहान जैसे जीवनसाथी और माखनलाल चतुर्वेदी जैसा पथ-प्रदर्शक पाकर वो राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग लेती रहीं और कई बार जेल भी गईं। वैसे तो उनके दो कविता संग्रह तथा तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए पर उनकी ज्यादा प्रसिद्धि ‘झांसी की रानी’ और ‘चेतक’ जैसी कविताओं के कारण है।

कविताओं में प्रखरता के साथ गूंजी राष्ट्रीयता निश्चित तौर पर उनकी रचनात्मकता का केंद्रीय स्वर है पर स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार कारावास की यातना सहने के बाद उन्होंने जिस तरह अपनी अनुभूतियों को कहानियों में व्यक्त किया है, वह उनकी रचनात्मकता को समग्रता प्रदान करता है। चित्रात्मक व सरल भाषा और ऐसी ही आडंबरहीन शैली उनकी रचनात्मक सादगी को एक ऐसी विलक्षणता से भरता है, जिसने पाठकों के बीच लगातार उन्हें समादृत बनाए रखा है।

उनका जन्म 16 अगस्त, 1904 को इलाहाबाद के निहालपुर गांव में हुआ था। सुभद्रा जी ने नौ साल की उम्र में अपनी पहली कविता ‘नीम’ लिखी थी। यह कविता ‘मर्यादा’ नाम की पत्रिका में छपी थी। उनकी पढ़ाई नौवीं कक्षा के बाद छूट गई, लेकिन इससे साहित्य में उनकी पकड़ कहीं से भी कम न हो पाई। 15 फरवरी 1948 को मात्र 44 वर्ष की आयु में काल के के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया। उनकी मृत्यु पर माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा कि सुभद्रा जी का चल बसना प्रकृति के पृष्ठों पर ऐसा लगता है मानो नर्मदा की धारा के बिना तट के पुण्य तीर्थों के सारे घाट अपना अर्थ और उपयोग खो बैठे हों।

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