शख्सियतः मोहब्बत और तरन्नुम का शायर शकील बदायूंनी


हिंदी फिल्मों के जिस पचास और साठ के दशक को गीतों के लिहाज से यादगार माना जाता है, उस दौर की एक बड़ी खासियत यह रही कि हिंदी और उर्दू के कई बड़े कवियों-शायरों ने फिल्मों के लिए गाने लिखे। फिल्मी गानों से इतर देखें तो यह वह दौर था जब मंच से कविता जनता के दिलों तक पहुंच रही थी। कविता का मंच तब आज की तरह हल्का या फूहड़ लतीफेबाजी का अड्डा नहीं था। शकील बदायूंनी इस दौर के बड़े शायर थे। प्रकाश पंडित ने उनके बारे में लिखा है, ‘शकील बेहद मशहूर शायर थे। समूचे हिंदुस्तान में उनकी शायरी ने झंडे गाड़ दिए थे। वजह थी उनका बेपनाह तरन्नुम, शेरों की बेपनाह चुस्ती और अनुभूति की बेपनाह तीव्रता। मैंने उन्हें कई ऐसे मुशायरों में भी दाद पाते देखा है, जहां श्रोतागण मानो कसम लेकर आते हैं कि किसी भी शायर को हूट किए बिना न छोड़ेंगे।’

फिल्मों में एक दौर में शकील की लोकप्रियता और कामयाबी का आलम यह था कि उन्हें लगातार तीन बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। उन्हें 1961 में ‘चौदहवीं का चांद हो’, 1962 में ‘हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं’ और 1963 में ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’ के लिए यह सम्मान मिला।

‘चौदहवीं का चांद’, ‘मुगल-ए-आजम’ और ‘मदर इंडिया’ जैसी शानदार फिल्मों के सदाबहार नगमे लिखने वाले शकील को फिल्मों में पहला मौका1947 में आई फिल्म ‘दर्द’ में मिला। नौशाद की धुन में लिखा गाना ‘अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का, आंखों में रंग भरके तेरे इंतजार का’ काफी हिट हुआ। शकील ने नौशाद के साथ 20 साल से भी ज्यादा काम किया था। 1951 में ‘दीदार’ फिल्म में नौशाद-शकील की जोड़ी ने कमाल कर दिया। ‘बचपन के दिन भुला न देना, आज हंसे कल रुला न देना’ गाने ने धूम मचा दी थी। इस तरह शकील जनता की पहली पसंद बन गए।

शकील का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में तीन अगस्त, 1916 को हुआ। वे बचपन से ही शायरी का शौक रखते थे। 1936 में अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। इसी दौरान उन्होंने मुशायरों में हिस्सा लेने का सिलसिला शुरू किया। स्नातक करने के बाद वे सरकारी नौकरी में आए। मगर वे दिल से शायर ही रहे। 1944 में शकील मुंबई चले गए। वहां उन्होंने संगीतकार नौशाद साहब की सोहबत में कई मशहूर फिल्मों के गीत लिखे।

शकील की कामयाबी के पीछे एक बड़ा राज यह था कि वे हिंदुस्तान के हर बड़े मुशायरे का लंबे समय तक हिस्सा रहे। इस दौरान उन्होंने यह बात बखूबी समझी कि मशहूर होने के लिए सुखन के साथ अंदाजे बयां भी चुस्त होना चाहिए, तिस पर अल्फाज अगर सादे हों और आसान जबान में लिखे जाएं तो सोने पर सुहागा है। मुंबई आकर उन्होंने सादे अंदाज में गजल कहना और मुकम्मल कर लिया था।

शकील के आलोचक उन्हें सिर्फ मोहब्बत के अफसाने लिखने वाला शायर कहते थे। दरअसल, उन पर यह ठप्पा उन अदीबों-शायरों की तरफ से लगा था जो उन दिनों लेखन में प्रगतिशीलता के नारे बुलंद कर रहे थे। सरदार जाफरी ने उनके लिए कहा है, ‘शकील गजल कहना भी जानते हैं और गाना भी। मैं अपनी अदबी जिंदगी में उनसे दूर रहा हूं लेकिन उनकी गजल से हमेशा कुर्बत महसूस की है।’ दिलचस्प है कि जाफरी खुद बड़े प्रगतिशील शायर थे। साहिर ने तो शकील के बारे में यहां तक कहा है कि जिगर और फिराक के बाद की पीढ़ी में शकील अकेले शायर हैं जिन्होंने अपनी कला के लिए गजल का क्षेत्र चुना है।

शकील बदायूंनी
जन्म : 03 अगस्त 1916
निधन : 20 अप्रैल 1970

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