श्री सिद्धबली धाम में पूरी होती हैं मन्नतें


देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र भूमि सिद्ध पुरुषों की तपस्थली रही है। इस पवित्र देवभूमि पौड़ी गढ़वाल जिले के द्वार कोटद्वार में खोह नदी के तट पर ऊंची पहाड़ी में अत्यंत प्राचीन श्री सिद्धबली धाम स्थित है। इस पवित्र पहाड़ी में नाथ संप्रदाय के धर्म गुरु संस्थापक गुरु गोरक्षनाथ ने हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस मंदिर की मान्यता इतनी है कि जो भी श्री सिद्धबली धाम मन्नत लेकर आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता और उसकी मन्नत पूरी होती है।

कलयुग में श्री राम भक्त हनुमान जी सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले भगवान माने जाते हैं इस सिद्ध पीठ में पूरे साल देश-विदेश से आए भक्तों का तांता लगा रहता है। सिद्ध पीठ सिद्धबली धाम में जिस वक्त की मन्नत पूरी होती है। वह यहां पर भंडारे का आयोजन करता है। इसलिए यहां 8-10 साल पहले से भंडारों की बुकिंग होनी शुरू हो जाती है। 2026 तक यहां भंडारों की पूरी तरह से बुकिंग हो चुकी है।

यहां पर मंगलवार, शनिवार और रविवार को भंडारों का विशेष महत्त्व माना जाता है। वैसे यहां पूरे साल हर दिन भंडारों का सिलसिला लगा रहता है परंतु मंगलवार और शनिवार हनुमान जी और रविवार को सिद्ध योगी गुरु गोरखनाथ का पवित्र दिन माना जाता है, इसीलिए इन दिनों दिनों में भंडारों का विशेष महत्त्व है। यहां मन्नत पूरी होने पर भक्त मंदिर में गुड़ की भेली, बताशे और नारियल चढ़ाते हैं परंतु गुड़ की भेली चढ़ाने का विशेष महत्त्व माना जाता है। गुरु गोरख नाथ की तपस्थली गुरु गोरक्षनाथ और हनुमान जी के संयुक्त नाम से जानी जाती है।

सिद्धबली धाम में स्थिति गर्भ गृह में गुरु गोरखनाथ जी और हनुमान जी की पिंडियां स्थित हैं। यहां स्थित हनुमानजी की दिव्य भव्य विशाल प्रतिमा के दाहिनी ओर सिद्ध योगी गोरक्षनाथ जी और दाहिनी ओर राम भक्त हनुमान जी की पिंडी विराजमान है। यह पहला ऐसा सिद्ध धाम है, जहां पर गुरु गोरखनाथ और हनुमान जी की पूजा एक साथ की जाती है।

सिद्ध गोरक्षनाथ और बली हनुमान जी के संयुक्त नामों से इस धाम का नाम श्री सिद्धबली धाम पड़ा है। हनुमान जी इस क्षेत्र में रहने वाले सभी प्राणियों की रक्षा करते हैं उनका यह स्थान कोटद्वार खोह नदी से लेकर उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद तक माना जाता है। इसलिए यहां पर उत्तराखंड के साथ-साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी बड़ी तादाद में भक्त दर्शन के लिए आते हैं। यह स्थान उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के श्रद्धालुओं के मिलन स्थल का प्रमुख केंद्र माना जाता है शादी, ब्याह, जन्मोत्सव और शुभ कार्य करने से पूर्व श्रद्धालु यहां पर मत्था टेकने आते हैं।

कोई व्यक्ति किसी संकट में हो, बीमार हो अथवा व्यापार में उसे घाटा हो तो वह सिद्धबली धाम में मत्था टेकता है और उसकी कठिनाई दूर होने पर वह फिर यहां पर भंडारा करता है या गुड़ की भेली का प्रसाद चढ़ाता है। खोह नदी कोटद्वार से आगे 40 किलोमीटर तक के क्षेत्र में खो जाती है और फिर धामपुर में जाकर निकलती है 40 किलोमीटर के रास्ते में यह नदी कहां खो जाती है। आज तक यह रहस्य किसी को पता नहीं चला है। इसलिए इस नदी को खोह नदी के नाम से जाना जाता है।

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के क्षेत्र में कोटद्वार नगर से करीब ढाई किमी दूर लैंसडौन विधानसभा क्षेत्र में पवित्र पावन सिद्ध पीठ श्री सिद्धबली हनुमान मंदिर का महत्त्व सबसे अधिक है। खोह नदी के किनारे पर करीब 40 मीटर ऊंचे टीले पर ये मंदिर स्थित है। यहां प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, जिनकी मनोकामना पूरी होती हैं, वे भक्त भंडारा करवाते हैं। दरअसल, यहां से कोई भक्त आज तक कभी खाली हाथ नहीं लौटा है। यहां पर दिसंबर में मंसिर मास में तीन दिन का सिद्धबली का मेला भरता है।

इस मेले के पहले दिन सिद्धबली की पावन शोभा यात्रा निकाली जाती है और दूसरे दिन सिद्धबली को पवित्र कौमुदी नदी के पावन जल से स्नान कराया जाता है और उनकी भव्य पूजा अर्चना और आरती की जाती है। भारतीय डाक विभाग की ओर से भी साल 2008 में मंदिर के नाम एक डाक टिकट जारी किया गया था।






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