सवाल बरकरार : पूर्वी लद्दाख में चीन की सेना कैसे और कब जाएगी एलएसी पर?


शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: योगेश साहू
Updated Sat, 10 Apr 2021 10:07 PM IST

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भारत ने पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में सैन्य तैनाती को मजबूत किया है। कोशिश है कि चीन की सेना ने पिछले साल 2020 में जिस तरह से एक तरफा एलएसी की स्थिति को बदलने का प्रयास किया था, वह दुबारा न कर पाए। इसके साथ ही एक बड़ा अनुत्तरित सवाल यह है कि डेपसांग, गेगरापोस्ट, हॉट स्प्रिंग क्षेत्र से चीन की सेना कब पीछे हटकर एलएसी पर जाएगी? इस सवाल का उत्तर देने में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को संकोच हो रहा है। वह कहते हैं कि प्रयास जारी है और जैसे ही कोई इस तरह की स्थिति आएगी, सूचना दी जाएगी।

रक्षा मंत्रालय के पास भी इसी तरह का जवाब है। रक्षा मंत्रालय के अधिकारी कहते हैं कि पैंगोंग त्सो झील के एरिया के पास से चीन की सेना पीछे हटकर एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर चली गई है। आपसी सहमति के अनुरूप भारतीय सेना ने भी पीछे हटकर अपनी तैनाती को अंतिम रूप दे दिया है। इसके अलावा फिलहाल मंत्रालय के पास कोई और जानकारी नहीं है।

रक्षा मंत्रालय ने पिछले बयान में कहा था कि पैंगोंग त्सो झील क्षेत्र के पास बनी सहमति में भारत ने पूर्वी लद्दाख के किसी अन्य क्षेत्र पर अपना दावा नहीं छोड़ा है। मतलब साफ है कि डेपसांग, हॉटस्प्रिंग और गोगरा पोस्त पर दावा बरकरार है। इसको लेकर चीन के सैन्य कमांडरों के साथ अगले दौर की वार्ता में मुद्दा उठेगा।

चीन के सैन्य कमांडर और राजनयिक अभी अपनी जिद पर अड़े हैं?
शुक्रवार को भारत और चीन के सैन्य कमांडरों ने वार्ता की। सैन्य सूत्र बताते हैं कि यह वार्ता कई घंटे चली। इसके आगे वह कुछ नहीं बता सके। यह 13वें दौर की सैन्य कमांडर स्तरीय वार्ता थी। वार्ता के बाद न तो भारत से और ना ही चीन की तरफ से कोई बयान आया। हालांकि वार्ता के तीन उद्देश्य थे। पहला उद्देश्य- पिछली सहमति की अनुपालना की समीक्षा थी। दूसरा उद्देश्य- डेपसांग, हॉट स्प्रिंग, गोगरापोस्ट पर भारत द्वारा अपने दावे को रखना और चीन के सैन्य कमांडर से वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करने का प्रस्ताव था।

तीसरा उद्देश्य- लद्दाख और पूरी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भ्रामक स्थिति से बचने तथा सीमा पर शांति, स्थायित्व और सौहार्द के प्रयासों को बढ़ाना था। ताकि दोनों देशों के बीच में अप्रिय घटना की पुनरावृत्ति न हो। संकेत हैं कि 13वें दौर की वार्ता में चीन के सैन्य कमांडर अपने दावे पर अड़े रहे और डेपसांग, गोगरापोस्ट, हॉटस्प्रिंग क्षेत्र में भारत के दावे पर चर्चा करने में कोई गंभीरता नहीं दिखाई।

चीन मामले को लंबे समय तक खीचना चाहता है
चीन की रणनीति पूर्वी लद्दाख में सैन्य वापसी के मुद्दे को टालने की है। पिछले सप्ताह विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। अरिंदम ने कहा कि पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में चीन के सैनिकों के पीछे हटने से ही सीमा क्षेत्र में शांति बहाली और द्विपक्षीय रिश्तों में प्रगति हो सकती है। बागची ने माना कि पश्चिमी क्षेत्र में भारत और चीन के सैन्य कमांडरों तथा राजनयिक और राजनीतिक स्तर पर बनी सहमति एक अच्छा कदम थी। उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर के बयान का भी हवाला दिया। 

विदेश मंत्री ने कहा है कि पूर्वी लद्दाख में लंबे समय तक ऐसे हालात बने रहना दोनों देशों के हित में नहीं है। विदेश और सामरिक मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि यदि भारत की चिंताओं को सुनकर चीन के राजनयिक और सैन्य कमांडर ईमानदारी से प्रयास करना चाहें तो पूर्वी लद्दाख का मसला दो सप्ताह में हल हो सकता है। लेकिन वास्तविकता यही है कि चीन की नियत साफ नहीं है।

विस्तार

भारत ने पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में सैन्य तैनाती को मजबूत किया है। कोशिश है कि चीन की सेना ने पिछले साल 2020 में जिस तरह से एक तरफा एलएसी की स्थिति को बदलने का प्रयास किया था, वह दुबारा न कर पाए। इसके साथ ही एक बड़ा अनुत्तरित सवाल यह है कि डेपसांग, गेगरापोस्ट, हॉट स्प्रिंग क्षेत्र से चीन की सेना कब पीछे हटकर एलएसी पर जाएगी? इस सवाल का उत्तर देने में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को संकोच हो रहा है। वह कहते हैं कि प्रयास जारी है और जैसे ही कोई इस तरह की स्थिति आएगी, सूचना दी जाएगी।

रक्षा मंत्रालय के पास भी इसी तरह का जवाब है। रक्षा मंत्रालय के अधिकारी कहते हैं कि पैंगोंग त्सो झील के एरिया के पास से चीन की सेना पीछे हटकर एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर चली गई है। आपसी सहमति के अनुरूप भारतीय सेना ने भी पीछे हटकर अपनी तैनाती को अंतिम रूप दे दिया है। इसके अलावा फिलहाल मंत्रालय के पास कोई और जानकारी नहीं है।

रक्षा मंत्रालय ने पिछले बयान में कहा था कि पैंगोंग त्सो झील क्षेत्र के पास बनी सहमति में भारत ने पूर्वी लद्दाख के किसी अन्य क्षेत्र पर अपना दावा नहीं छोड़ा है। मतलब साफ है कि डेपसांग, हॉटस्प्रिंग और गोगरा पोस्त पर दावा बरकरार है। इसको लेकर चीन के सैन्य कमांडरों के साथ अगले दौर की वार्ता में मुद्दा उठेगा।

चीन के सैन्य कमांडर और राजनयिक अभी अपनी जिद पर अड़े हैं?

शुक्रवार को भारत और चीन के सैन्य कमांडरों ने वार्ता की। सैन्य सूत्र बताते हैं कि यह वार्ता कई घंटे चली। इसके आगे वह कुछ नहीं बता सके। यह 13वें दौर की सैन्य कमांडर स्तरीय वार्ता थी। वार्ता के बाद न तो भारत से और ना ही चीन की तरफ से कोई बयान आया। हालांकि वार्ता के तीन उद्देश्य थे। पहला उद्देश्य- पिछली सहमति की अनुपालना की समीक्षा थी। दूसरा उद्देश्य- डेपसांग, हॉट स्प्रिंग, गोगरापोस्ट पर भारत द्वारा अपने दावे को रखना और चीन के सैन्य कमांडर से वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान करने का प्रस्ताव था।

तीसरा उद्देश्य- लद्दाख और पूरी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भ्रामक स्थिति से बचने तथा सीमा पर शांति, स्थायित्व और सौहार्द के प्रयासों को बढ़ाना था। ताकि दोनों देशों के बीच में अप्रिय घटना की पुनरावृत्ति न हो। संकेत हैं कि 13वें दौर की वार्ता में चीन के सैन्य कमांडर अपने दावे पर अड़े रहे और डेपसांग, गोगरापोस्ट, हॉटस्प्रिंग क्षेत्र में भारत के दावे पर चर्चा करने में कोई गंभीरता नहीं दिखाई।

चीन मामले को लंबे समय तक खीचना चाहता है

चीन की रणनीति पूर्वी लद्दाख में सैन्य वापसी के मुद्दे को टालने की है। पिछले सप्ताह विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। अरिंदम ने कहा कि पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में चीन के सैनिकों के पीछे हटने से ही सीमा क्षेत्र में शांति बहाली और द्विपक्षीय रिश्तों में प्रगति हो सकती है। बागची ने माना कि पश्चिमी क्षेत्र में भारत और चीन के सैन्य कमांडरों तथा राजनयिक और राजनीतिक स्तर पर बनी सहमति एक अच्छा कदम थी। उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर के बयान का भी हवाला दिया। 

विदेश मंत्री ने कहा है कि पूर्वी लद्दाख में लंबे समय तक ऐसे हालात बने रहना दोनों देशों के हित में नहीं है। विदेश और सामरिक मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि यदि भारत की चिंताओं को सुनकर चीन के राजनयिक और सैन्य कमांडर ईमानदारी से प्रयास करना चाहें तो पूर्वी लद्दाख का मसला दो सप्ताह में हल हो सकता है। लेकिन वास्तविकता यही है कि चीन की नियत साफ नहीं है।



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