सृष्टि में सबसे पहले प्रकट हुए सूर्यदेव, कहलाए आदित्य 


माघ माह के सातवें दिन रथ सप्तमी का त्योहार मनाया जाता है, इस दिन को सूर्य जयंती के रूप में भी जाना जाता है। भगवान ब्रह्माजी के चारों मुखों से चार वेद आविर्भूत हुए और ओंकार के तेज से मिलकर जो स्वरूप उत्पन्न हुआ वही सूर्यदेव हैं। सूर्य स्वरूप सृष्टि में सबसे पहले प्रकट हुए इसलिए इनका नाम आदित्य पड़ा। भगवान सूर्यदेव को जीवन का स्रोत माना जाता है। 

सूर्य ऐसे देव हैं जिन्हें साक्षात देखा जा सकता है। सूर्यदेव की उपासना से सदा निरोगी रहने का वरदान प्राप्त होता है। सूर्यदेव की उपासना से बड़े से बड़ा अशुभ टल जाता है। सूर्यदेव की नित्य आराधना करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। सूर्यदेव का एक नाम सविता भी है। जिसका अर्थ है सृष्टि करने वाला। इन्हीं से जगत उत्पन्न हुआ है। नवग्रहों में सूर्य सर्वप्रमुख देवता हैं। सात घोड़ों वाले इनके रथ में एक ही चक्र है, जो संवत्सर कहलाता है। इस रथ में बारह अरे हैं जो बारह महीनों के प्रतीक हैं। चक्र, शक्ति, पाश और अंकुश इनके मुख्य अस्त्र हैं। सूर्यदेव की प्रसन्नता के लिए उन्हें नित्य अर्घ्य देना चाहिए। बौद्ध धर्म में भगवान सूर्य को सभी तीर्थों में निवास करने और उनकी रक्षा करने के लिए माना जाता है। भगवान सूर्य को प्रसन्न करने के लिए गेहूं का दान करना शुभ माना जाता है। जब भी भगवान सूर्य को जल अर्पित करें वह पात्र तांबे का होना चाहिए। लाल और पीले वस्त्रों का दान करने से सूर्यदेव प्रसन्न होते हैं। उत्तर दिशा में सूर्यदेव की मूर्ति या चित्र लगाने से घर में कभी आर्थिक परेशानी नहीं होती। सूर्यदेव की मूर्ति लगाने से घर से रोग दूर हो जाते हैं।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।



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