Magh Purnima 2021: माघ पूर्णिमा आज, जानिए शुभ मुहूर्त, दान व स्नान का महत्व, व्रत नियम और कथा


Magh Purnima 2021: आज माघ पूर्णिमा है। हिंदू धर्म में माघ पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है। माघ पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान और दान करने वाले व्यक्ति के सारे पाप मिट जाते हैं। मान्यता है कि माघी पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु स्वयं गंगा नदी में स्नान करते हैं। इसलिए माघ पूर्णिमा के दिन जो भी गंगा स्नान करता है उसको सभी तरह के पुण्य की प्राप्ति होती है।  कहा जाता है कि माघ पूर्णिमा के दिन शुभ मुहूर्त में पूजा करने से बैकुंठ की प्राप्ति होती है।

पद्मपुराण के अनुसार, भगवान विष्णु जप, तप और स्नान से बाकी महीनों में उतना प्रसन्न नहीं होते हैं जितना कि वे माघ मास में स्नान करने से होते हैं। माघ मास में स्नान के अलावा दान का भी विशेष महत्व है। इस महीने में कंबल, गुड़ और तिल का दान उत्तम माना जाता है।

माघ पूर्णिमा 2021 तिथि और शुभ मुहू्र्त-

पूर्णिमा तिथि शुरू- 15:50- 26 फरवरी 2021
पूर्णिमा तिथि खत्म- 13:45- 27 फरवरी 2021

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माघ पूर्णिमा व्रत नियम-

इस दिन लोग लोग पवित्र नदियों के तट पर सुबह-सुबह स्नान करते हैं।
इसके बाद माघ पूर्णिमा व्रत नियमों का पालन करते हैं।
 भगवान विष्णु की पूजा मंदिर में या अपने घरों में करनी चाहिए।
विष्णु पूजा पूरी होने के बाद, भक्त सत्यनारायण कथा का पाठ करते हैं।
 गायत्री मंत्र ’या ओम नमो नारायण’ मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।
गरीबों या जरूरमद को वस्त्र दान करें।

माघ पूर्णिमा व्रत कथा-

एक पौराणिक कथा के अनुसार, कांतिका नगर में धनेश्वर नाम का ब्राह्मण निवास करता था। वह अपना जीवन निर्वाह दान पर करता था। ब्राह्मण और उसकी पत्नी के कोई संतान नहीं थी। एक दिन उसकी पत्नी नगर में भिक्षा मांगने गई, लेकिन सभी ने उसे बांझ कहकर भिक्षा देने से इनकार कर दिया। तब किसी ने उससे 16 दिन तक मां काली की पूजा करने को कहा। उसके कहे अनुसार ब्राह्मण दंपत्ति ने ऐसा ही किया। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर 16 दिन बाद मां काली प्रकट हुई। मां काली ने ब्राह्मण की पत्नी को गर्भवती होने का वरदान दिया और कहा कि अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम दीपक जलाओ। इस तरह हर पूर्णिमा के दिन तक दीपक बढ़ाती जाना जब तक कम से कम 32 दीपक न हो जाएं।

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ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को पूजा के लिए पेड़ से आम का कच्चा फल तोड़कर दिया। उसकी पत्नी ने पूजा की और फलस्वरूप वह गर्भवती हो गई। प्रत्येक पूर्णिमा को वह मां काली के कहे अनुसार दीपक जलाती रही। मां काली की कृपा से उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम देवदास रखा। देवदास जब बड़ा हुआ तो उसे अपने मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेजा गया। काशी में उन दोनों के साथ एक दुर्घटना घटी जिसके कारण धोखे से देवदास का विवाह हो गया। देवदास ने कहा कि वह अल्पायु है परंतु फिर भी जबरन उसका विवाह करवा दिया गया। कुछ समय बाद काल उसके प्राण लेने आया लेकिन ब्राह्मण दंपत्ति ने पूर्णिमा का व्रत रखा था, इसलिए काल उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया। तभी से कहा जाता है कि पूर्णिमा के दिन व्रत करने से संकट से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।



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